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दमोह जिला जेल में गूंजे ‘जय श्रीराम’ के जयघोष — भक्ति रस में डूबा सुधार गृह, पर सवालों के घेरे में प्रशासन की कार्यशैली!

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  1. दमोह जिला जेल में गूंजे ‘जय श्रीराम’ के जयघोष — भक्ति रस में डूबा सुधार गृह, पर सवालों के घेरे में प्रशासन की कार्यशैली!

दमोह जिला जेल में शुक्रवार को राघव चरित्रामृत श्रीरामकथा के द्वितीय दिवस का आयोजन बड़े ही श्रद्धा और भक्ति भाव से संपन्न हुआ। पूरा जेल परिसर “जय श्रीराम, जय जय श्रीराम” के उद्घोषों से गूंज उठा।
कथा वाचन का कार्य पूज्य पंडित राघव प्रिया सृष्टि भट्ट जी ने किया। उन्होंने भगवान श्रीराम के जीवन की घटनाओं के माध्यम से धर्म, सत्य और आदर्श जीवन जीने का संदेश दिया।
जेल अधीक्षक छोटेलाल प्रजापति के मार्गदर्शन में यह आयोजन हुआ, जिसमें बंदीगण, जेल स्टाफ और अधिकारीगणों ने मिलकर भक्ति रस का आनंद लिया।


बंदीगणों ने कहा —
“ऐसे आध्यात्मिक आयोजनों से हमें आत्मिक शांति मिलती है और जीवन में नई दिशा मिलती है।”
सभी उपस्थितों ने अधीक्षक प्रजापति के इस प्रयास की सराहना की और इसे “सुधार की ओर एक सच्चा कदम” बताया।

लेकिन सवाल भी उठे…
जहां एक ओर यह आयोजन जेल में सकारात्मक वातावरण बनाने का सराहनीय प्रयास है, वहीं जेल की आंतरिक कार्यप्रणाली को लेकर कई गंभीर सवाल भी उठ रहे हैं।
सूत्र बताते हैं कि कुछ समय से दमोह जेल में अनियमितताएं, घूसखोरी और नशे की खुली पहुंच जैसी शिकायतें भी सामने आती रही हैं।
कई बार ऐसी खबरें आईं कि कुछ कैदी जेल में ही मादक पदार्थों और शराब का सेवन करते पाए गए। वहीं, घूस देकर विशेष सुविधाएं लेने के आरोप भी चर्चा में हैं।
इन सबके बीच श्रीरामकथा जैसा आयोजन जेल के भीतर भले ही एक सकारात्मक छवि प्रस्तुत करता हो, लेकिन यह भी आवश्यक है कि धार्मिक आयोजनों के साथ प्रशासनिक सुधार भी उतनी ही गंभीरता से किए जाएं।

आध्यात्मिकता के साथ ईमानदारी भी जरूरी
एक ओर जेल में ‘रामकथा’ के जरिए संस्कार और सुधार की बात की जा रही है, तो दूसरी ओर प्रशासनिक ईमानदारी पर प्रश्नचिन्ह बना हुआ है।
कथा के इस पावन आयोजन से निश्चित ही कई बंदियों के मन में भक्ति और आत्म-सुधार की भावना जागी है, लेकिन अगर जेल व्यवस्था में सुधार नहीं हुआ तो यह आध्यात्मिक प्रयास केवल दिखावा बनकर रह जाएगा।

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