दमोह में छात्राओं की आत्महत्या ने झकझोरा शहर, एक ही स्कूल की दो बेटियों की मौत से शिक्षा व्यवस्था पर उठे गंभीर सवाल!
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दमोह में छात्राओं की आत्महत्या ने झकझोरा शहर, एक ही स्कूल की दो बेटियों की मौत से शिक्षा व्यवस्था पर उठे गंभीर सवाल!
दमोह। शहर में तीन दिन के भीतर दो नाबालिग छात्राओं द्वारा आत्महत्या किए जाने की घटनाओं ने पूरे जिले को झकझोर कर रख दिया है। हैरानी की बात यह है कि दोनों छात्राएं शहर के प्रतिष्ठित माने जाने वाले सेंट जॉन्स स्कूल में अध्ययनरत थीं। एक ही स्कूल की दो छात्राओं का इस तरह आत्मघाती कदम उठाना अब सिर्फ एक हादसा नहीं, बल्कि पूरी शिक्षा व्यवस्था और स्कूल प्रबंधन की भूमिका पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े करता है।
घर में अकेली थी दसवीं की छात्रा, फांसी लगाकर दी जान

दमोह देहात थाना क्षेत्र के सागरनाका पुलिस चौकी अंतर्गत गोकुलधाम सुरेखा कॉलोनी निवासी कक्षा दसवीं की छात्रा साक्षी पांडे (16 वर्ष) ने अपने घर में चुनरी से फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली। परिजन उसे जिला अस्पताल लेकर पहुंचे, जहां डॉक्टरों ने मृत घोषित कर दिया।
घटना के समय छात्रा घर पर अकेली थी। मां निजी अस्पताल में भर्ती थीं और पिता घर से बाहर थे। पुलिस पंचनामा कार्रवाई के दौरान छात्रा के लोवर की जेब से एक ब्लेड और किसी दवा का पत्ता बरामद हुआ है। मोबाइल फोन जब्त कर साइबर सेल जांच की जा रही है।

दो दिन पहले नौवीं की छात्रा ने लिखा ‘सॉरी’, फिर फांसी
इससे पहले 2 फरवरी को कोतवाली थाना क्षेत्र की पुरानी हाउसिंग बोर्ड कॉलोनी में रहने वाली कक्षा नवमी की छात्रा हरकीरत कौर (15 वर्ष) ने फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली थी।
परिजनों के अनुसार छात्रा पढ़ाई में होशियार थी, उसके पास निजी मोबाइल भी नहीं था। घटना स्थल से कागज पर लिखा ‘सॉरी’ मिला है। आत्महत्या के कारणों का अब तक खुलासा नहीं हो सका है। पुलिस मर्ग जांच कर रही है।

एक ही स्कूल, दो आत्महत्याएं — महज़ इत्तेफाक या सिस्टम की नाकामी?
एक ही स्कूल की दो छात्राओं द्वारा तीन दिन के भीतर आत्महत्या किया जाना शहर में चर्चा का विषय बन गया है। सवाल उठ रहे हैं कि—
क्या पढ़ाई के नाम पर बच्चों पर अत्यधिक मानसिक दबाव डाला जा रहा है?

क्या स्कूलों में काउंसलिंग और भावनात्मक सहयोग सिर्फ कागजों तक सीमित है?
क्या परीक्षा परिणाम और “स्कूल की ब्रांडिंग” बच्चों की मानसिक सेहत से ज्यादा महत्वपूर्ण हो गई है?
पूर्व छात्रा के परिजनों का आरोप — ‘बच्चों को पढ़ाया नहीं, दबाया गया’
सेंट जॉन्स स्कूल की एक पूर्व छात्रा के परिजनों ने नाम न छापने की शर्त पर गंभीर आरोप लगाए हैं। उनका कहना है कि लॉकडाउन के दौरान बच्ची पढ़ाई में पिछड़ गई थी, लेकिन स्कूल प्रबंधन ने उसकी भरपाई के लिए कोई सकारात्मक कदम नहीं उठाया।

इसके बजाय बच्चों पर मोटी किताबों और रटंत पढ़ाई का बोझ डाल दिया गया। मानसिक दबाव बढ़ता गया। जिला अस्पताल के काउंसलिंग अधिकारी द्वारा स्कूल प्रबंधन को पत्र लिखे जाने के बावजूद कोई ठोस सुधार नहीं किया गया। अंततः परिजनों को बच्ची का स्कूल बदलना पड़ा।
प्रशासन हरकत में, एसपी की पहल — ‘हौसला पेटी’ लागू
लगातार सामने आ रही घटनाओं के बाद जिला प्रशासन ने मामले को गंभीरता से लिया है। पुलिस अधीक्षक के मार्गदर्शन में जिले के सभी स्कूलों में “हौसला पेटी” स्थापित करने के निर्देश दिए गए हैं।
इस पेटी के माध्यम से छात्र-छात्राएं बिना नाम बताए अपनी समस्याएं, डर, दबाव या उत्पीड़न की शिकायत दर्ज करा सकेंगे। पुलिस समय-समय पर पेटियों की जांच कर त्वरित कार्रवाई करेगी।
अब सवाल यह है—

क्या सिर्फ “हौसला पेटी” से बच्चों का दबाव खत्म हो जाएगा?
क्या शिक्षा विभाग स्कूलों की अकादमिक नीतियों और मानसिक स्वास्थ्य व्यवस्था की जांच करेगा?
क्या जिम्मेदार स्कूल प्रबंधन पर कड़ी कार्रवाई होगी या मामला ठंडे बस्ते में चला जाएगा?
दमोह की ये दो बेटियां अब लौटकर नहीं आएंगी, लेकिन अगर सिस्टम नहीं जागा तो सवाल सिर्फ सेंट जॉन्स तक सीमित नहीं रहेंगे।
यह वक्त है कि शिक्षा को नंबरों की दौड़ नहीं, बल्कि बच्चों के भविष्य और मानसिक सुरक्षा से जोड़ा जाए।
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