दमोह के सट्टा किंग जिनका सट्टा दमोह जिले की सातों ब्लॉक में धड़ल्ले से पिछले 30 सालों से जारी है! दो दशकों से नहीं पकड़ पाई पुलिस!
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बड़ी बड़ी खबरों के बीच छूट जाती हैं महत्वपूर्ण छोटी खबरें जिनसे होता है जनता का सीधा सरोकार छोटी महत्वपूर्ण खबरों के लिए देखते रहे डेंजर भारत |
दमोह जिले में सट्टा किंग के नाम से मशहूर मनोहर कलई वाले अपने जीवन काल में अधिकांश समय उन्होंने सट्टा खिलाते हुए गुजारे अपने जीवन काल में मात्र वह दो से तीन बार ही पुलिस के हत्थे चढ़े 1990 में बनर्जी टीआई ने जब सट्टेबाजों पर बहुत बड़ी मुहिम चलाई थी जिसमें जिले के सभी सटोरियों को पर्ची सहित पकड़ने में कामयाबी पाई थी उस वक्त भी मनोहर कलई वालों को बनर्जी टीआई की इतनी इतनी सखती और इतना मजबूत खुफिया तंत्र होने के बावजूद भी मनोहर कलई वालों तक पुलिस नहीं पहुंच पाई थी और उनके 2 से 5 साल के कार्यकाल में एक भी बार बनर्जी मनोहर कलई वालों को

नहीं पकड़ पाए उसके बाद 2000 में जब दमोह में टीआई बनकर जग्गी साहब आए तब पहली बार मनोहर कलई वाले के पुत्र अभिषेक असाटी गांजे में गिरफ्तार हुए और उनके पिता मनोहर कलई वाले भी गांधी एवं सट्टे की पर्ची के साथ गिरफ्तार हुए जिसमें वह कई दिन तक जेल में रहे और छूट कर फिर से सट्टेबाजी और गांजे के कारोबार में लग गए और अपने बेटे को भी उस धंधे के सारे हुनर सिखा गए मनोहर कलई वाले मनोहर असाटी कलई वाले का निधन 26 जून 2019 को हो जाने के बाद अपने पिता से ही सीखें हुनर !अभिषेक असाटी आज अपने पिता के पद चिन्हों पर चलते हुए उनसे भी बड़े सट्टा किंग बन चुके हैं जिन्हें जग्गी साहब के समय 2000 में पकड़ा गया था उसके बाद आज 21 साल बाद भी पुलिस उसे दबोच नहीं पा रही है कल जब पुलिस अभिषेक का पीछा कर रही थी तो वह बहुत स्पीड में आकर पुलिस को चकमा देकर रास्ते में गाड़ी खड़ी कर के अंदर घुस गया और ताला लगा लिया तो पुलिस द्वारा उसकी गाड़ी ऑटो से सिटी कोतवाली ले जाई गई अभिषेक असाटी को पुलिस नहीं पकड़ सकी अब देखना होगा अभिषेक असाटी की गाड़ी को जप्त करने के बाद उसकी गाड़ी से क्या बरामद होता है और पुलिस उस तक पहुंच पाती है कि नहीं!

मध्य प्रदेश सरकार को भी चाहिए कि ऐसे संगठित अपराधों पर अंकुश लगाने के लिए महाराष्ट्र सरकार ने संगठित अपराध अधिनियम, 1999 के महाराष्ट्र कंट्रोल (mAh। 30/1999) एक कानून के राज्य द्वारा अधिनियमित है महाराष्ट्र में भारत का मुकाबला संगठित अपराध और आतंकवाद के लिए 1999 में। [1] [2] ‘ मकोका ‘ के रूप में जाना जाने वाला अधिनियम, राज्य सरकार को इन मुद्दों से निपटने के लिए विशेष शक्तियां प्रदान करता है, जिसमें निगरानी की शक्तियां, सुगम साक्ष्य मानकों और प्रक्रियात्मक सुरक्षा उपायों, और मृत्युदंड सहित अतिरिक्त आपराधिक दंड निर्धारित करना शामिल है। यह कानून भारतीय जनता पार्टी और शिवसेना की गठबंधन सरकार द्वारा पेश किया गया था ।

जब बदमाश संगठित अपराध कर कर बेनामी संपत्ति और अपने खौफ का दुरुपयोग कर लोगों को डराने धमकाने के साथ-साथ चुनाव में भी दखल देने लगते हैं और उनकी ताकत चौगुनी हो जाती है तब पुलिस भी मजबूर हो जाती है कि अब इनके ऊपर क्या कार्यवाही करें और अगर कार्रवाई करते भी हैं तो उनकी धाराएं इतनी कमजोर होती हैं कि वह महज 1 से 2 दिन के अंदर बाहर आ जाते हैं और अपना साम्राज्य दोबारा से चलाने लगते हैं यही वजह थी कि महाराष्ट्र की तरह उत्तर प्रदेश सरकार ने भी संगठित अपराध को जड़ से खत्म करने के लिए महाराष्ट्र की मकोका की तर्ज पर कोका कानून बना कर अपराधियों की बेनामी संपत्ति कुर्क कर और जनता में दहशत बनाए बाहुबलियों को जेल भेजा जिससे उत्तर प्रदेश में शांति व्यवस्था बन सकी

ऐसे ही मध्य प्रदेश में कई बाहुबली है जो रेत माफिया और भूमाफिया जुएं और सट्टे के कारोबार और हथियारों के कारोबार चला रहे हैं संगठित अपराध कर करोड़ों की संपत्ति बना ली और पुलिस के पास ऐसी कोई भी संगठित अपराध पर कार्यवाही करने की धाराएं नहीं है जिससे इन बदमाशों पर कड़ी से कड़ी कार्यवाही की जा सके और इन संगठित अपराधियों की कमर टूट सके अब जरूरत है कि जब दशकों से बदमाश और संगठित अपराधी बचते आ रहे हैं तो उन पर लगाम लगाने के लिए महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश जैसे कानून बनाने की जरूरत है
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