सैंया भए कोतवाल तो फिर डर काहे का।
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सैंया भए कोतवाल तो फिर डर काहे का।
दमोह की सड़कों पर रेहड़ी पटरी वालों को हढकातें ट्राफिक वाले गरीब व्यापारियों को तो आए दिन ही अपनी वर्दी का रौब दिखाते नजर आते हैं। लेकिन इनकी वर्दी की ताकत और सच्ची जनसेवा देशभक्ति धरी की धरी रह जाती है जब सत्ता के नशे में चूर भाजपाइयों की गाड़ियों को नहीं देख पाते यू तो दमोह ट्रैफिक पुलिस हर चौराहों पर रेहड़ी पटरी पर अपना व्यवसाय करने वाले गरीब व्यक्तियों को डराती धमकाती दिखाई देती नजर आती रहती है कई बार तो यहां तक देखा गया की दमोह ट्राफिक द्वारा गरीब रेहड़ी पटरी वालों की तराजू भी उठा ली जाती है लेकिन जब बात सत्ताधारी पार्टी की हो तो

यही ट्राफिक पुलिस आंख मूंद लेती है जबकि भारतीय जनता पार्टी कार्यालय से महज चंद कदमों की दूरी पर ट्राफिक चौकी होने के बावजूद भी ट्रैफिक पुलिस ऐसी आंखें बंद करके बैठी है । दमोह ट्रैफिक पुलिस को भाजपा कार्यालय के सामने भाजपा के नेताओं और पदाधिकारियों द्वारा घंटाघर से ट्रैफिक कोतवाली जाने वाली सड़क को आए दिन गाड़ियां लगाकर बंद कर दी जाती है इससे यह कहानी सार्थक नजर आती है कि सैंया भए कोतवाल तो फिर डर काहे का।

सत्ता पक्ष से भला दमोह ट्राफिक सड़क जाम की वजह भी नहीं पूछती ना ही कोई कार्यवाही करती है लगता तो ऐसा है कि ट्राफिक पुलिस शायद कमजोर गरीब लोगों के लिए ही बनाया गया है। जहां चेकिंग के नाम पर ट्रैफिक पुलिस और सिटी कोतवाली पुलिस आए दिन चौराहों पर जाम लगाकर गरीब अपनी मजदूरी कर घर जा रहे लोगों की चालानी कार्यवाही करती दिखाई देती है तो वही रेहड़ी पटरी पर अपना व्यवसाय चलाने वालों पर अपनी वर्दी का रौब दिखाई देती नजर आती है।

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