पटेरा में सरकारी शराब ठेके बने लूट का अड्डा आबकारी विभाग–ठेकेदार की मिलीभगत से सरकार की गाइडलाइंस की खुलेआम उड़ाई जा रही धज्जिया!
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पटेरा में सरकारी शराब ठेके बने लूट का अड्डा
आबकारी विभाग–ठेकेदार की मिलीभगत से सरकार की गाइडलाइंस की खुलेआम उड़ाई जा रही धज्जिया!
दमोह जिले की पटेरा जनपद पंचायत अंतर्गत संचालित शासकीय शराब ठेकों पर सरकार की मंशा और नियमों को ताक पर रखकर खुलेआम जनता को लूटा जा रहा है। यह लूट किसी एक दुकानदार तक सीमित नहीं, बल्कि जिला आबकारी विभाग और शासकीय ठेकेदार की कथित मिलीभगत से पूरे क्षेत्र में निरंकुश तरीके से चल रही है।

सरकारी गाइडलाइंस के अनुसार प्रत्येक शराब दुकान पर—
शराब का पक्का बिल देना अनिवार्य है
रेट लिस्ट का स्पष्ट डिस्प्ले होना जरूरी है
नाबालिगों को शराब न बेचने संबंधी बोर्ड लगाना अनिवार्य है
निर्धारित सरकारी दरों पर ही बिक्री की जानी चाहिए
लेकिन पटेरा जनपद की जमीनी हकीकत इन नियमों को मुंह चिढ़ाती नजर आ रही है।

40 प्रतिशत तक महंगी बिक रही शराब
स्थानीय उपभोक्ताओं के अनुसार, यहां शराब सरकारी रेट से 40 प्रतिशत तक महंगी बेची जा रही है।
₹100 की शराब → ₹140 में
₹180 की शराब → ₹220 में
बिना बिल, बिना रेट लिस्ट और बिना किसी डर के यह अवैध वसूली रोज़ाना की जा रही है। इससे साफ जाहिर होता है कि ठेकेदार को प्रतिदिन हजारों नहीं बल्कि लाखों की अवैध कमाई हो रही है।
नियमों की निगरानी किसकी जिम्मेदारी?

सरकार की गाइडलाइंस का पालन कराना जिला आबकारी विभाग की सीधी जिम्मेदारी है। सवाल यह उठता है कि—
क्या आबकारी विभाग जानबूझकर आंखें मूंदे बैठा है?
या फिर ठेकेदारों के साथ साझेदारी में यह अवैध कारोबार चल रहा है?
यदि मिलीभगत नहीं होती तो अब तक—
ठेकों को सस्पेंड किया जा सकता था
ठेकेदार पर लाखों का जुर्माना लगाया जा सकता था
लेकिन कार्रवाई के नाम पर सन्नाटा प्रशासन की भूमिका पर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है।

जनता लुटे, अफसर मौन
पटेरा क्षेत्र की जनता जहां महंगी शराब खरीदने को मजबूर है, वहीं आबकारी विभाग की चुप्पी यह संकेत दे रही है कि कहीं न कहीं प्रशासनिक संरक्षण इस लूट को मिल रहा है।
अब देखना यह है कि—
क्या जिला प्रशासन इस समाचार के बाद जागेगा?
या फिर पटेरा की शराब दुकानें यूं ही जनता की जेब काटती रहेंगी?
यह मामला न सिर्फ आर्थिक शोषण का है, बल्कि प्रशासनिक जवाबदेही और पारदर्शिता की भी गंभीर परीक्षा है।
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