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दमोह में ‘राजश्री’ की कालाबाजारी का खेल! बोरी पर ₹5,570 अतिरिक्त वसूली, रोजाना लाखों की अवैध कमाई का आरोप! डेंजर भारत प्रमुख तनुज पाराशर दादा भाई

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दमोह में ‘राजश्री’ की कालाबाजारी का खेल! बोरी पर ₹5,570 अतिरिक्त वसूली, रोजाना लाखों की अवैध कमाई का आरोप
दमोह। जिले में पान मसाला ब्रांड Rajshree को लेकर बड़ा खुलासा सामने आया है। आरोप है कि स्थानीय एजेंसी द्वारा बाजार में कृत्रिम कमी (आर्टिफिशियल शॉर्टेज) पैदा कर पुराने स्टॉक को ब्लैक में बेचा जा रहा है। बजट से पहले ट्रकों में माल स्टॉक कर लिया गया, जबकि बजट के बाद नए प्रिंट का माल अभी बाजार में आया भी नहीं है। इसके बावजूद कमी का माहौल बनाकर ऊंचे दामों पर बिक्री की जा रही है।
बोरी पर ₹5,570 की अतिरिक्त वसूली!


सूत्रों और कई दुकानदारों के मुताबिक, जो बोरी सामान्यतः ₹24,300 में मिलनी चाहिए, वह वर्तमान में ₹29,870 में बेची जा रही है। यानी प्रति बोरी ₹5,570 अतिरिक्त वसूले जा रहे हैं।
खुदरा स्तर पर भी हालात चिंताजनक हैं—
₹330 का पैकेट ₹390 में बेचा जा रहा है।
₹40 की पाउच मजबूरी में ₹45 में बेची जा रही है।
₹230 का पैकेट ₹290 तक पहुंच गया, जिसकी ₹20 की पाउच ₹25 में बिक रही है।


दुकानदारों का कहना है कि वे भी ऊंचे दाम पर माल लेने को मजबूर हैं, इसलिए उपभोक्ताओं पर बोझ डालना पड़ रहा है।
रोजाना 500 बोरी की खपत, ₹28 लाख से ज्यादा ‘एक्स्ट्रा’ कमाई?
जानकारी के अनुसार दमोह जिले में प्रतिदिन करीब 500 बोरी की खपत होती है। यदि प्रति बोरी ₹5,570 अतिरिक्त वसूले जा रहे हैं, तो रोजाना लगभग ₹27,85,000 (करीब ₹28 लाख) की अतिरिक्त कमाई का अनुमान बनता है। आरोप है कि इस राशि का बंटवारा एजेंसी और चुनिंदा 2–3 बड़े दुकानदारों के बीच हो रहा है।
चुनिंदा दुकानदारों को ही सप्लाई?


आरोप यह भी है कि एजेंसी मालिक आकाश जैन द्वारा पूरे शहर में समान रूप से माल उपलब्ध कराने के बजाय कुछ गिने-चुने दुकानदारों को ट्रकों में सप्लाई दी जा रही है, जबकि अन्य व्यापारियों को एक बोरी भी नहीं मिल रही। जांच के दौरान एजेंसी की ओर से कथित तौर पर कहा गया कि “हम सीधे माल नहीं देते, हमारे तय दुकानदारों से ले लीजिए।” इससे बाजार में एकाधिकार और कृत्रिम कमी की आशंका और गहराती है।
जीएसटी और नापतौल विभाग पर सवाल


कई दुकानदारों का आरोप है कि ऊंचे दाम पर बिक्री के बावजूद पक्का जीएसटी बिल नहीं दिया जा रहा। ऐसे में जीएसटी विभाग और नापतौल विभाग की भूमिका पर भी सवाल उठ रहे हैं। यदि बिलिंग में गड़बड़ी है तो यह कर चोरी और उपभोक्ता अधिकारों का सीधा उल्लंघन है।
प्रशासन कब लेगा संज्ञान?
जुए-सट्टे से ज्यादा कमाई के आरोपों के बीच आम उपभोक्ता खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहा है। सवाल यह है कि क्या जिला प्रशासन, खाद्य एवं औषधि विभाग, जीएसटी और नापतौल अधिकारी इस कथित कालाबाजारी की निष्पक्ष जांच करेंगे?
अगर आरोप सही हैं तो यह न केवल उपभोक्ताओं के साथ अन्याय है, बल्कि बाजार व्यवस्था पर भी सीधा हमला है।
अब देखना होगा—क्या प्रशासन की नींद टूटेगी और दोषियों पर कार्रवाई होगी, या फिर उपभोक्ता यूं ही लुटते रहेंगे?

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