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दमोह के सिद्ध क्षेत्र जागेश्वर नाथ पर आज भी सैकड़ो वर्षों से आ रहे यदुवंशी । जाने क्या है मान्यता और क्यों आते हैं हजारों लाखों की संख्या में यदुवंशी।

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  1. दमोह के सिद्ध क्षेत्र जागेश्वर नाथ पर आज भी सैकड़ो वर्षों से आ रहे यदुवंशी । जाने क्या है मान्यता और क्यों आते हैं हजारों लाखों की संख्या में यदुवंशी।

देव जागेश्वर नाथ धाम दमोह में हजारों सालों की परंपरा को आगे बढ़ाते हुए नवयुवक अपने बुजुर्गों से चली आ रही परंपराओं को निभाते हुए आ रहे हैं बताया जा रहा है कि द्वापर में श्री कृष्णा ने देवकी नंदन के यहां प्रकट होकर दुनिया को कुछ ना कुछ सीखने के लिए कई लीलाएं की जिनमें से एक लीला उनकी यह भी हैं लोगो को अपनी लीलाएं दिखाने के लिए वृंदावन में यशोदा के यहां

बचपन में पूरी लीलाएं की जिनमें प्रमुख रूप से उन्होंने बचपन में दीपावली के पावन पर्व पर इंद्र देवता का घमंड तोड़ने के उद्देश्य से जहां गोवर्धन पर्वत को अपनी उगली पर उठाकर लोगों को गोवर्धन की पूजा करने का मार्ग बताया तो वही इंद्र के घमंड को भी तोड़ा श्री कृष्ण ने यदुवंशी कुल में जन्म लेकर बचपन से ही गायो के बीच रहे और गायो को खिलाया और गायो को बचपन से ही जंगल में चराने ले गए और दीपावली के पावन पर्व के बाद मान्यता है कि यदुवंशी समाज अपने आराध्य श्री कृष्णा के बताएं रास्ते पर चलते हुए आज भी दीपावली के बाद जिन गौ माता को चराने ले जाते हैं

उन गौ पालकों के घर जाकर दीपावली दिवारी नृत्य किया जाता है ऐसी ही परंपरा हमारे बुंदेलखंड क्षेत्र में भी देखने को मिलती है दीपावली के दिन से जब दीपावली के दिया भरे जाते हैं उसी दिन से यदुवंशी समाज में घर का प्रमुख व्यक्ति मोन धारण करता है फिर दीपावली के दूसरे दिन बांदकपुर तीर्थ क्षेत्र अपने पूरे परिवार के साथ पहुंचकर देव श्री जागेश्वर नाथ के सामने नृत्य कर

 

आशीर्वाद लेते है यही वजह है कि आज भी बुंदेलखंड में यह परंपरा बनी हुई है की दीपावली के दूसरे दिन सभी यादव समाज और यदुवंशी समाज के लोग बड़ी संख्या में बांदकपुर पहुंचकर दिवारी नृत्य करते हैं जिसमें प्रमुख रूप से मोर पंख और लाठी लेकर नगाड़े और ढोलक के संगीत पर नाचते हैं ऐसा ही नजारा आज बांदकपुर में देखने को मिला जहां यादव समाज के हजारों युवा दिवारी नृत्य करते नजर आए और बुजुर्गों की परंपरा को आज भी निभाते हुए दिखाई दिए।

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