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ब्रिटिश कालीन मिले सिक्के का मामला संदेह के घेरे में। डेंजर भारत प्रमुख तनुज पाराशर।

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ब्रिटिश कालीन मिले सिक्के का मामला संदेह के घेरे में। डेंजर भारत प्रमुख तनुज पाराशर।

विगत दिवस मंगलवार को दमोह शहर के असाटी वार्ड नं 1 में प्रीतम उपाध्याय के मकान में निर्माण का कार्य कर रहे पांच बेलदारों में से एक मजदूर को पिलर की खुदाई के दौरान ब्रिटिश कालीन चांदी के सिक्के मिले जिन्हें उसके द्वारा एक दिन बाद बुधवार को कोतवाली पुलिस के सुपुर्द कर दिया गया है। मजदूर को उसकी ईमानदारी पर तारीफ मिल रही है और सरकार भी पुरातन सिक्के शासकीय कोष में जमा कराने के एवज में ईमानदारी से हिस्से के रूप में लगभग सत्तर हजार के आसपास रूपये भी उक्त मजदूर को देगी।

इस संबंध में अनेक ऐंसे प्रश्न हैं जिससे उक्त मजदूर का व्यवहार संदेह के घेरे में नजर आ रहा है जिसकी बारीकी से जांच पड़ताल करने पर असलियत सामने आ सकती है जिसका उल्लेख स्वयं मकान मालिक की ओर से भी हो रहा है।


जिस तरह कुछ लोगों के द्वारा उस मजदूर को ईमानदार बताकर उसके बताये कथन अनुसार सिक्कों को ही सही माना जा रहा है लेकिन ईमानदारी पर संदेह यह उठ रहा है कि जब उसको पिलर खोदते समय पुराने गडे सिक्के मिले तो उसने अपने अन्य मजदूरों को तुरंत क्यों नहीं व
बताया और काम छोडकर पेट दर्द का बहाना बनाकर अपने घर उन सिक्कों को लेकर क्यों चला गया?

कई दशकों से जमीन के अंदर गडे सिक्के आखिर जब पुलिस के पास जमा कराये गये तो उन पर मिट्टी वगैरह क्यों नहीं लगी मिली और वे एकदम साफ चमचमाते नजर आये तो उन्हें किसने साफ
किया और क्यों?

जब मजदूर मिले सिक्कों को बिना किसी को बताये चुपके से अपने साथ घर ले गया तो यह कैसे तय किया जा सकता है कि उसने जितने सिक्के जमा कराये उतने ही सिक्के उसको मिले होंगे और वे किस किस धातु के थे?

सभी जानते हैं पुलिस का काम करने का अपना तरीका होता है और वैसे भी दमोह में ही ऐंसे अनेक मुद्दे हैं जिनके निराकरण पर आज भी लोगों द्वारा संदेह व्यक्त किया जाता रहा है फिर चाहे वह एक महाविद्यालय में कर्मचारी के आत्महत्या करने का पटाक्षेप हो या फिर एक निजी नर्सिंग होम में कर्मचारी द्वारा आत्म हत्या करने के मामलों पर पुलिस पर सवालिया निशान खड़े होते नजर आए हैं? अब देखना होगा इस मामले में जांच कहां तक होती  है और उठते प्रश्नों का समाधान कहा तक और कब तक हो पाता है।

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