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अतिक्रमणकारी के सामने झुका प्रशासन!बांदकपुर की प्राचीन बावड़ी बनी सौंदर्य का नमूना— बंद दरवाज़ों के पीछे!डेंजर भारत प्रमुख तनुज पाराशर दादा भाई

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अतिक्रमणकारी के सामने झुका प्रशासन!बांदकपुर की प्राचीन बावड़ी बनी सौंदर्य का नमूना— बंद दरवाज़ों के पीछे!

दमोह जिले के प्रसिद्ध तीर्थस्थल बांदकपुर में प्रशासन की बेबसी और अतिक्रमणकारी की दबंगई का एक शर्मनाक उदाहरण सामने आया है।

जहां एक ओर जिला प्रशासन ने जल संवर्धन अभियान के तहत सैकड़ों वर्षों पुरानी प्राचीन बावड़ी का जीर्णोद्धार और सौंदर्यीकरण तो कर दिया—वहीं दूसरी ओर, बावड़ी का मुख्य द्वार अब भी एक अतिक्रमणकारी मुन्ना तिवारी के कब्जे में है, जो अदालत से केस हारने के बावजूद वहां से हटाया नहीं जा सका है।

आस्था की जगह, ताले और जालियों में कैद!

प्रशासन ने बावड़ी को सुरक्षित करने की बात कहकर जाली और ताले लगा दिए, ताकि कोई अंदर न जा सके। कारण दिया गया कि भीड़भाड़ में कोई गिर न जाए—लेकिन सच्चाई यह है कि प्रशासन खुद अतिक्रमण हटाने में नाकाम रहा।

सावन के पावन महीने में हजारों की संख्या में भक्त श्री जागेश्वरनाथ मंदिर बांदकपुर पहुंचते हैं। लोग चाहते हैं कि वह इस पुनर्जीवित की गई बावड़ी को भी देखें, इसके इतिहास को जानें, इसकी सुंदरता का अनुभव करें। लेकिन प्रशासन की “तालाबंदी” नीति ने इस सांस्कृतिक धरोहर को आम लोगों की नज़रों से छिपा दिया है।

सवाल उठता है —

अगर अतिक्रमण न हटे, तो ऐसा जीर्णोद्धार किसके लिए?

जनता के पैसों से बनी सुंदर संरचना को जनता ही न देख सके — क्या यही प्रशासनिक सफलता है?

अदालत से हारने के बावजूद प्रशासन क्यों अतिक्रमणकारी के आगे नतमस्तक है?


“Danger Bharat News” पूछता है —
बावड़ी पर ताला, आस्था पर ताला, प्रशासन की चुप्पी क्या किसी दबाव का नतीजा है?
क्या जनता के हक और आस्था से बड़ा हो गया है अतिक्रमणकारी का रसूख?

अब देखना होगा कि प्रशासन इस समाचार के बाद नींद से जागता है या फिर यह ताले पूरे सावन भर इसी तरह जनता की आस्था और इतिहास पर लटके रहेंगे।प्राचीनता को ताले से नहीं, दर्शन से पहचान मिलती है।बावड़ी को जनता को सौंपो — यह हमारी संस्कृति की मांग है!

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